देशभर में महामारी 2.0: डिप्रेशन, तनाव और आत्महत्या के बढ़ते केस
नई दिल्ली। जहां फिर एक बार विगत वर्ष की भांति कोरोना वायरस महामारी एक नई रफ्तार से अपना प्रकोप दिखा रहा है वहीं एक अन्य वायरस बड़ी तेजी से उभरता नजर आ रहा है जिसके संकेत अब आमतौर पर अपने आसपास के लोगों में और खुद में भी देखे जा रहे है लेकिन सरकार का अभी इस ओर कोई विशेष ध्यान नही है।
जी हां। इस नई महामारी का नाम है मानसिक स्वास्थ्य महामारी या महामारी 2.0। यह कोरोना की तरह ही गंभीर है और परिणामस्वरूप लोगों की जान जा रही है। यह शहर या गांव का भी फर्क नही जानता। न ही यह समस्या किसी उम्र विशेष के लोगों में ही होती है।
देशभर में बहुत ही तेज रफ्तार के साथ फैल रही यह मानसिक महामारी अनेक लोगों की जान ले चुकी है। लोग यहां लॉकडाउन की वजह से नौकरी जाने, बच्चों की स्कूल फीस देने और अन्य समस्याओं से जूझ रहा है वहीं कोई आत्महत्या कर रहा है तो कोई इस समस्या के कारण जीने की अपनी आखिरी आशा खोने की कगार पर है।
माइंडसेलो कंपनी ने लोगों से इस बारे में बात की तो उनके विभिन्न पहलू सामने आए। बहुत से लोगों ने स्वीकार किया कि उनके रिश्ते लॉकडाउन की वजह से तनावपूर्ण हो चुके है। युवाओं ने भी स्वीकार किया कि वो दिशा और लक्ष्य विहीन महसूस कर रहे है और यह देश की आने वाले सालों में विकास और प्रगति की दशा और दिशा को निर्धारित करने वाला है।
परिवारों के बीच बढ़ रही दूरियां और तनाव, लोगों का बुरी और डरावनी खबरों के विषय में बात करना, एक सकारात्मक दृष्टिकोण की कमी आदि इसके महत्वपूर्ण कारक है।
अगर इसकी भयावहता के लक्षणों की बात करे तो लोगों का डर डर कर जीना, निराशा से पूर्ण जीवन जीना, छोटी छोटी बातों पर परेशान हो जाना, नींद न आना, एकाग्रता की कमी, चिंतित रहना, रिश्तों में तनाव, नकारात्मक नजरिया और निराशा से पूर्ण सोच इसके कुछ मुख्य लक्षण है।
हाल ही में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 150 मिलियन भारतीयों को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सहायता की आवश्यकता थी और भारत में इस मामले में संसाधनों की बेहद कमी है - 1 लाख रोगियों के लिए एक मनोचिकित्सक.
गौरतलब है कि यह महामारी एक विशेष ध्यान देने योग्य है क्योंकि इससे पीड़ित रोगी खुद अपनी परेशानियों के विषय में किसी से साझा नही कर पाते है और अगर आसपास के लोग एक आंतरिक स्तर पर रोगी से न जुड़े हो तो समस्या के गंभीर हो जाने पर लगातार बढ़ रहे पारिवारिक तनाव, रिश्तों में लड़ाई, आत्महत्या आदि के रूप में इसके परिणाम आते है।
सरकार का भी इसके निवारण को लेकर कोई विशेष रुझान देखने को नहीं मिल रहा है जबकि यह बड़ी ही तेजी से फैल रही है। हम अगर अपने आसपास देखे तो हर कोई डिप्रेशन, तनाव, नकारात्मक विचारों, हद से ज्यादा गुस्सा, अत्यधिक सोच आदि से परेशान है।
इस बढ़ती महामारी का असर कोरोना महामारी पर भी देखने को मिल रहा है जहां सभी लोग एक बार कोरोना पॉजिटिव हो जाने पर जीवन जीने की आशा ही छोड़ देते है वहीं आइसोलेट में रहने वाले लोग अकेलेपन के कारण डिप्रेशन, तनाव, मानसिक समस्याओं, नकारात्मक विचार आदि का शिकार होकर महामारी की चपेट में आ जाते है। साथ ही लॉकडाउन की वजह से लोगों की नौकरियां फिर से जा रही है और यह भी एक महत्वपूर्ण कारण सामने आ रहा है।
विडंबना यह है कि समाज की आंखें कहीं जाने वाली टीवी मीडिया, प्रिंट मीडिया, ऑनलाइन मीडिया और सोशल मीडिया आदि भी इस महामारी को बढ़ावा देने में एक उत्प्रेरक का कार्य कर रहे है। जहां सोशल मीडिया के युग में सभी लोग अपने सोशल प्रोफाइल्स पर खुद के संपादक बनकर किसी भी प्रकार की खबर या पोस्ट को प्रेषित करते रहते है वहीं लोगों का नकारात्मक खबरों या पोस्ट को अग्रेषित कर देना भी हमारे समाज की एक विडंबना है। लेकिन इस समस्या से उभरा जा सकता है और यह बहुत आसान है।
मानसिक रूप से अस्वस्थ होना, अकेलेपन को महसूस करना, डिप्रेशन, तनाव, आत्महत्या संबंधी विचार, नकारात्मक विचारों का आना आदि बस एक अनुभव मात्र है। रिसर्च और देश की पहली आत्मिक विकास पर कार्य कर रही कंपनी माइंडसेलो ने यह दावा किया है कि अगर हम अपनों के साथ ज्यादा समय बिताते है, उनसे बाते करते है अच्छे अनुभवों के बारे में और अच्छी खबरों को उनको बताते है, अच्छी किताबें पढ़ते है तो इस महामारी से काफी हद तक उभरा जा सकता है।
साथ ही अपनों की भावनाओं को महसूस करना, समय निकालकर उनको सुनना आदि भी बुरे विचारों को खत्म करता है। इसलिए सभी देशवासियों को चाहिए कि वो एक जागरूक नागरिक होने के कर्तव्य को निभाए और इस समस्या के निवारण हेतु समस्या के गंभीर होने से पहले ही जरूरी कदम उठाकर इसके निवारण में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करें।
(लेखक अमन कुमार एक जागरूक नागरिक है जो विभिन्न मुद्दों पर अपनी स्वतंत्र राय रखना पसंद करता है।)

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