इस्लाम में फसाद नही केवल भाई चारा बढ़ाने की मंजूरी। | NMPK Media @Baghpat

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सुरेंद्र मलनिया
हमारा भारत एक अमन की जमीन है और यहाँ रहने वाले व्यक्ति अमन (शांति) को पसंद करते हैं और मुसलमानों को बांटकर नफरत फैलाने वाले लोगों को हमें आईना दिखाना चाहिए कि वो हमें बिल्कुल अलग-अलग और टुकड़े टुकड़े नहीं कर सकते क्योंकि इस्लामी रिवायत, अमल-तहजीब इसकी बिल्कुल भी इजाजत नहीं देती। इस्लाम में फ़साद की कोई जगह नहीं है, इसके साथ साथ हमारे मुल्क की तहज़ीब व कल्चर जो अमन व भाईचारे पर जिसकी बुनियाद है उससे भी फ़साद, अराजकता लड़ाई दूर-दूर तक मेल नहीं खाते नबी-ए-मोहतरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया था कि एक मुसलमान को साबित कदम रहना चाहिए और अपने मुल्क के कानून पर अमल करना चाहिए। इस्लाम के पहले खलीफा हज़रत अबू बक्र सिद्दकी ने जो नबी ए-करीम के दोस्त और ससुर भी थे। सियासी (राजनैतिक) फायदे के जंग से मना फ़रमाया और ऐलान किया कि जो मुल्क मुसलमानों को पूरी आज़ादी से अपने मजहब पर अमल करने की इजाजत दे उनसे इस्लामी ताकतें जंग न करें बल्कि उन्हें अपना दोस्त माने। हमें हमारे गलत नज़रियों ने और गलत (प्रचार व प्रसार) नश्रो इशाअत ने बर्बाद कर डाला है। हम पिछड़ते जा रहे हैं इससे बचकर काम करने के लिए कदम बढ़ाया जाए, एक-दूसरे की हमदर्दी का जज्बा (भावना) और इंसाफ की बात को आम करना व इंसाफ के काम को आम करना बड़ी अहम जिम्मेदारी है। कुरान करीम के मुताबिक अल्लाह इंसाफ (स्थापित) करना चाहता है और उन्हें पसंद करता है जो इंसाफ पसंद हैं। अल्लाह फसाद करने वालों को पसंद नहीं करता क्योंकि अल्लाह तआला अमन को पसंद फरमाता है।

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