मेरठ के गांव बिजौली में मनाई जाती है अकल्पनीय होली | NMPK Media @Baghpat

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बागपत। विपुल जैन 
मेरठ-हापुड़ रोड पर स्थित बिजौली गांव में होली के बाद दुल्हेंडी के दिन 700 वर्ष से चली आ रही परम्परा अब प्रथा बन गई है और हर वर्ष इसे यहाँ के लोग बड़ी धूमधाम से मनाते है।
इस सम्बन्ध में नेहरू युवा केंद्र बागपत के पूर्व लेखाकार एवं वर्तमान में गाजियाबाद के लेखाकार मुकन्द वल्लभ शर्मा ने गांव के इस कार्यक्रम के सम्बन्ध में वहां के नेहरू युवा केंद्र के कार्यकर्ताओं ललिता त्यागी, रचना त्यागी और प्राची त्यागी से बात कर पूरी जानकारी जुटाई।  बताया कि इस गांव में दुल्हेंडी के दिन गांववासी सुबह से ही रंग की होली खेलते हैं और दोपहर बाद साफ कपड़े पहनकर तख्त प्रथा के अनुसार गांव में सात तख्त निकालते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक तख्त पर दो से तीन युवाओं के शरीर को लोहे की नुकीली कीलों से बींधा जाता है। उसके बाद युवाओं को तख्त पर खड़ा कर उस तख्त को अन्य युवा कंधे पर उठाकर बैंड बाजों के साथ पूरे गाँव की परिक्रमा करते है। उसके बाद गांव में बनी महात्मा गंगा पुरी की समाधि पर ले जाते हैं। जहां पर पूजा अर्चना कर वापस लौटते हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि शरीर से नुकीले हथियार निकालने के बाद घावों पर दवा के स्थान पर केवल होली की राख ही लगायी जाती है।गांव की निवासी और नेहरू युवा केंद्र की पूर्व एनवाईवी रचना त्यागी, प्राची त्यागी और कौशल विकास प्रशिक्षण की प्रशिक्षिका ललिता त्यागी ने इस सम्बन्ध में जानकारी देते हुए बताया कि तख्त निकालने के समय तख्त पर गुड का प्रसाद चढ़ाया जाता है और बाद में बाबा की समाधि पर बांटा जाता है। तख्त पर चढावे में आयी साड़ियों को गांव की गरीब लडकियों की शादी में दान किया जाता है तथा चढावे में आयी नकदी को इसी उत्सव के काम में उपयोग किया जाता है।

हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक है ये कार्यक्रम

इस कार्यक्रम की तैयारी हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर करते हैं, जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग नुकीले हथियार तैयार करते हैं, वहीं हिंदू अन्य तैयारी करते हैं। कार्यक्रम में सभी प्यार मोहब्बत के साथ भाग लेते हैं। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि जहाँ पूरे देश में हिंदू-मुस्लिमों को आपस में लडाने की कोशिश की जा रही है, वहीं बिजौली गांव में तख्त कार्यक्रम साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल बना हुआ है।


700 वर्षो से चली आ रही परंपरा को बंद करने की कोशिश हुई नाकाम

ललित त्यागी और रचना त्यागी ने बताया कि बुजुर्ग लोग बताते हैं कि इस परम्परा को रूढ़िवादी प्रथा बताकर बंद करने की कोशिश की गई। एक बार तख्त नहीं निकला गया तो गांव में बीमारी, आगजनी की घटना होने लगी। किसानों की फसलों में आग लग गई और अकाल पडने लगा। अतः फिर से इस परम्परा को उसी जोश के साथ शुरू कर दिया गया। इस कार्यक्रम को देखने के लिए गांव में जहाँ रिश्तेदारों की भीड जमा होती है, वहीं आसपास के गांवों के लोगों और दूर दराज के लोगों का भी जमावडा लगता है।

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