सपने अपने सजोये गरीबी में पढ़ा है
हर कदम उसका नए जोश के साथ बढ़ा है
जाना-माना आज है वो पत्रकार सोच पुरानी है उसकी, नए है उसके विचार
अपनी जन्मभूमि बागपत से है उसे प्यार
यही सोच मन में उसके आए कुछ विचार
ऐतिहासिक बागपत का हो रहा अपमान
यही सोच विपुल ने उठाया तीर कमान
लेखनी को अपनी ताकत बनाया
किया प्रभु श्री राम को प्रणाम
कितने आए और कितने चले गए लेकिन बागपत रहा हमेशा गुमनाम
महाभारत काल की बागपत भूमि
यमुना की धारा जिसके चरणों को चूमी
यहां के किसान यहां की एकता यहां की एकता को दिल्ली भी है देखता
चित्रकार वो पत्रकार वो हम क्या करें उनकी तुलना
गरीब हो या अमीर हर किसी से रहता है उनका मिलना-जुलना हिंदू- मुस्लिम-सिख -ईसाई सभी में है उनकी आस्था
नहीं कर पाया आज तक कोई उनकी व्याख्या
गुमनाम बागपत को भारत के मानचित्र पर ला दिया
यहां की ऐतिहासिक भूमि का दुनिया में लोहा मनवा दिया
यहां का खरबूजा हो या बालूशाही पत्रकार विपुल की कलम ने सबको स्थान दिलवा दिया
हालात से लड़कर आया रह गया एक मलाल
इस जिंदगी में रह गए कुछ अनसुलझे सवाल
अपनी लेखनी से कर दिया अच्छों अच्छों को हलाल
बागपत के विकास को गति देकर कर दिया कमाल
लिखते हैं कौशिक विपुल जैन की कहानी
आज बागपत में है विपुल सबकी जुबानी
लिखते रहें आप बागपत का अफसाना
हमारा बागपत ना हो कभी अपनों से बेगाना।
मनोज कौशिक कवि मवीकला बागपत
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