नन्हा पौधा | कविता | NMPK Media @Baghpat

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                 नन्हा पौधा 

मैनें एक पौधा रोपा है, कितना खुश है, यह भी, मैं भी,
यह झूम रहा है क्यारी में, मैं झूम रहा, अपने मन में।

नित सुबह शाम देखा करता, कब इसमे कलियां आएंगी,
कब फूल खिलेंगे डाली पर, जबसे यह पौधा रोपा है।

मुझको क्यो ऐसा लगता है, हर डाली पर हो फूल लगे,
तितली नाचे, भँवरे गाए, जो भी देंखे, वह मुस्काए।

पतझड का मौसम आएगा, यह सहमा सा रह जाएगा,
और पुनः बसन्त के आ जाने से, यह नव जीवन पाएगा।

मेघा जब इस पर बरसेंगे, यह झूमेगा, इठलाएगा,
सब देंखेंगे, मैं देखुंगा, यह पौधा सुख बरसाएगा।

मैनें एक पौधा रोपा है, कितना खुश है, यह भी, मैं भी,
यह झूम रहा है क्यारी में, मैं झूम रहा, अपने मन में।

प्रस्तुति-  विनेश मित्तल अध्यापक

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